मां सुरकंडा का पावन धाम, जहां इंद्र ने कठोर तप करके पाया खोया हुआ स्वर्ग का राज्य

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शारदीय नवरात्रि पर 9 दिन देवियां सीरीज में आज हम आपको मां जगदंबा को समर्पित पुण्यधाम मां सुरकंडा (Navratri, Mata Surkanda Temple ) के दर्शन करवा रहे हैं। माता सुरकंडा भवानी के मंदिर में आकर अद्भुत शांति औऱ भक्ति का अहसास होता है। माना जाता है कि इस मंदिर में एक बार जाने से सात जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है। सिद्धपीठ मां सुरकंडा देवी का मंदिर टिहरी के जौनुपर पट्टी में सुरकुट पर्वत पर स्थित है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव जब सती माता के विक्षत शव को लेकर हिमालय की ओऱ जा रहे थे, तो इउस स्थान पर माता का सिर गिर गया। तभी से ये स्थान सुरकंडा देवी सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

अन्य मान्यताओं के अनुसार सुरकंडा मंदिर को देवराज इंद्र से जोड़कर भी देखा जाता है। केदारखंड व स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्र ने यहां मां की आराधना कर अपना खोया हुआ साम्राज्य प्राप्त किया था। इस कारण ऐसा माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से माता के दर्शन करने यहां आता है मां उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
मां के दरबार से बद्रीनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ, चौखंबा, गौरीशंकर, नीलकंठ आदि सहित कई पर्वत श्रृखलाएं दिखाई देती हैं। मां सुरकंडा देवी के कपाट साल भर खुले रहते हैं।

सुरकंडा देवी मंदिर की एक खास विशेषता यह बताई जाती है कि यहां भक्तों को प्रसाद के रूप में रौंसली की पत्तियां दी जाती हैं। ये पत्तियां औषधीय गुणों भी भरपूर होती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन पत्तियों से घर में सुख समृद्धि आती है। क्षेत्र में इसे देववृक्ष या देवदार का दर्जा हासिल है। इसीलिए इस पेड़ की लकड़ी को इमारती या दूसरे व्यावसायिक उपयोग में नहीं लाया जाता।

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