मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ते के वादों से उत्तराखंड पर पड़ेगा 10 हजार करोड़ का बोझ, दिल्ली जलबोर्ड को 57 हजार करोड़ घाटे में रखने वाले केजरीवाल कैसे जुटाएंगे फंड?

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डायलॉग डेस्क: उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इसी को देखते हुए तमाम राजनातिक दल  वादों का पिटारा खोल रहे हैं। नई नई आम आदमी पार्टी ने भी युवाओं को लुभाने के लिए बडे़ बडे़ वादे किए हैं।  लेकिन क्या किसी भी दल में हवा हवाई घोषणाओं से पहले होमवर्क किया जाता है? दरअसल अरविंद केजरीवाल जी जब उत्तराखण्ड आये तो उन्होंने फ्री बिजली, 1 लाख नौकरी,बेरोजगारी भत्ता देने जैसे तमाम वादे किए हैं। लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि उनका रोडमैप क्या है। जो हवा हवाई घोषणाएं उन्होंने की हैं, उसके लिए कैसे सन्साधन जुटाएंगे,कैसे फंड की व्यवस्था करेंगे, इसका कोई जिक्र नहीं (Sky high promises by AAP, no framework for revenue earning) है। खासतौर से तब, जब हाल ही में एक आरटीआई में खुलासा हुआ है कि दिल्ली जल बोर्ड करीब 29 हजार करोड़ से ज्यादा के कर्ज में डूबा हुआ है। अगर इस पर ब्याज को भी जोड़ दें तो जल बोर्ड का कर्जा करीब 57000 करोड़ का आंकडा़ बैठता है।

इसी पर देवभूमि डायलॉग का फैक्ट चेक किया औऱ वो तमाम स्थितियां आपको सामने रखी हैं। जिससे आपको पता चल सके कि अघर सियासी दल वादे पूरा करने की करफ बढ़ भी जाएं, तो इससे राज्य केखजाने परकितना बोझ पड़ेगा।

चलिए पहले मुफ्त बिजली के वादे की बात करते हैं:
प्रदेश में कुल उपभोक्ता हैं – 26.70 लाख हैं। इसमें से भी घरेलू उपभोक्ता – 23 लाख से ज्यादा हैं। केजरीवाल जी ने हर उपभोक्ता को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली का वायदा किया है। अगर ऐसा करते हैं तो
राज्य के खजाने पर तकरीबन 1350 करोड़ रुपये का सालाना वित्तीय बोझ पड़ेगा।

1 लाख नौकरी की गारंटी

केजरीवाल ने कहा है कि उत्तराखंड में सत्ता में आने पर 6 माह में 1 लाख नौकरी की गारंटी दे रहे हैं। मान लीजिए कि वो अपने वादे पर कायम रहते हैं और सबसे निचले वेतन स्तर के कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं  तो हिसाब लगाइए, उत्तराखंड में एकचतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का वेतन करीब 28 हजार रुपये है। इस हिसाब से 1 लाख कर्मचारियों का मासिक वेतन करीब 280 करोड़ रुपये बैठता है। 1 लाख कर्मचारियों का वेतन देने पर ही राज्य के खजाने पर सालाना करीब 3360 करोड़ रुपये का भार पड़ता है।

बेरोजगारी भत्ते से चपत
प्रदेश में करीब 25 लाख परिवार हैं। हालांकि आम आदमी पार्टी 8 लाख लोगों को बेरोजगार मान कर चल रही है। केजरीवाल ने हर परिवार से एक व्यक्ति को ₹5000 मासिक बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है। इस दशा में केवल बेरोजगारी भत्ता देने के लिए ही सरकार को हर महीने 400 करोड़ रुपए की व्यवस्था करनी होगी। और सालभर में बेरोजगारी भत्ता देने के लिए 4800 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी।

यानी मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ता, 1 लाख नौकरी देकर वेतन पर ख़र्च में कुल मिलाकर एक साल में करीब 9510 करोड़ की व्यवस्था सरकार को करनी होगी।

समझ नहीं आता इतनी रकम कैसे जुटाएंगे। केजरीवाल कहते हैं कि हमने दिल्ली में किया तो उत्तराखंड में भी करेंगे। लेकिन जरा दिल्ली और उत्तराखंड के बजट पर भी नजर डाल लेते हैं।

उत्तराखंड का बजट 57000 करोड़ रुपये है, जबकि दिल्ली का बजट करीब 69000 करोड़ रुपये का है।

दोनों राज्यों की अपने स्रोतों से  (मसलन SGST,  सेल टैक्स/VAT, स्टेट एक्साइज, स्टांप ड्यूटी, वाहन कर आदि)  कमाई में उत्तराखंड दिल्ली से बहुत पीछे है। दिल्ली सरकार की कमाई 43000 करोड़ है,जबकी उत्तराखंड की कमाई मात्र 12754 करोड़ है।

बात फिर वही है, जिस राज्य की अपने स्रोतों से कमाई ही कुल 12754 करोड़ है, वहां फ्री बिजली और बेरोजगारी भत्ते पर ही करीब 10 हजार करोड़ का खर्च आ रहा है। और अभी इसमें किसानों को मुफ्त बिजली वाला सेक्शन नहीं जोड़ा गया है।

और ये हाल तब हैं जब हाल ही में एक आरटीआई में खुलासा हुआ कि दिल्ली जलबोर्ड पर करीब 57 हजार करोड़ का कर्ज है।  दरअसल दिल्ली के निवासी अरुण कुमार ने दिल्ली जल बोर्ड में एक आरटीआई दायर की थी और ये पूछा था कि आखिर दिल्ली जल बोर्ड पर अब कितना कर्ज है। इसके जवाब में दिल्ली जल बोर्ड ने ये जानकारी दी कि दिल्ली जल बोर्ड पर 29400 करोड़ रुपए का कर्ज है और साथ ही इसका ब्याज 28 हजार 33 करोड़ रुपए हो गया है।

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