2 अक्टूबर 1994 की वो काली रात जब  निहत्थे पहाड़ियों पर बरपा खाकी का कहर, 7 आंदोलनकारी हुए शहीद, रामपुर तिराहा कांड के 31 साल

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DEHRADUN:   देश भर में 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जा रही है। लेकिन, उत्तराखंड में 2 अक्टूबर का दिन एक काले दिन के रूप में याद किया जाता है। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान 1994 में 1 और 2 अक्टूबर की रात उत्तराखंड के इतिहास में कभी न भुलाए जाने वाली एक काली रात थी। आज रामपुर तिराहा कांड की जघन्य वारदात को 31 साल हो चुके हैं। (31 YEARS OF RAMPUR TIRAHA KAND)  मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिसिया जुल्म को याद करके जख्म अभी भी ताजे हो जाते हैं।

अलग राज्य की मांग के लिए तत्कालानी उत्तर प्रदेश के पहाड़ी हिस्से से आवाजें उठ रही थी। शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे थे। लेकिन सरकार मानों कानों में रुई डालकर सोई थी। उल्टा, राज्य सरकार शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे लोगों पर दमनात्मक कार्रवाई करने लगी।1 सितंबर को खटीमा और 2 सितंबर को मसूरी में गोलीकांड से इस आंदोलन की दिशा बदल गई। अब पहाड़ के लोग आर पार की लड़ाई के मूड में थे, लिहाजा सीधे दिल्ली जाकर अपनी मांग रखने की योजना पर काम हुआ।  अलग राज्य की मांग को लेकर सैकड़ों प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली जा रहे थे। गढ़वाल और कुमाऊं के सभी जिलों से करीब 250 बसों में भर भरकर युवा, महिलाएं , नौकरीपेशा लोग, छात्र छात्राएं अलग राज्य की मांग को लेकर जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जा रहे थे। कुमाऊं के जिलों से बसें हल्की नोंकझोंक के बाद दिल्ली पहुंच गई थी। गढ़वाल के पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग से भी बसें दिल्ली के लिए रवाना हुई थी। देहरादून, हरिद्वार, टिहरी औऱ उत्तरकाशी के आंदोलनकारी भी 24 बसों में बैठकर दिल्ली रवाना हो रहे थे।

लेकिन जैसे ही ये बसें देहरादून होते हुए मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पहुंची, तत्कालीन मुलायम सरकार का कहर इन पर टूट पड़ा। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और यह तय कर लिया गया था कि आंदोलनकारियों को आगे नहीं जाने देना है। पहले नारसन बार्डर पर नाकाबंदी हुई। यहां पर आंदोलनकारियों के आगे प्रशासन बेबस हो गया। बाकी बसों का काफिला आगे बढ़ा तो राज्य आंदोलनकारियों का सामना रामपुर तिराहे पर पूरी तैयारी के साथ मौजूद पुलिस प्रशासन से हुआ। कुछ आंदोलन की तपिश और कुछ भारी संख्या में जुटे लोगों की मौजूदगी का सबब था कि सत्ता का दमनात्मक रूप खुलकर सामने आ गया। उसके बाद जो हुआ, उसे याद कर रूह सिहर जाती है।

मुलायम सिंह सरकार के आदेश पर पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से जा रहे आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया।आंदोलनकारी डटे रहे तो पुलिस ने बाद फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर करीब 24 राउंड फायरिंग कर दी जिसमें 7 आंदोलनकारी शहीद हो गए, 17 लोग घायल हो गए। रातभर खाकी की दरिंदगी चलती रही। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। कुछ लोगों ने गन्ने के खेतों में जाकर अपनी आबरू और जान बचाई। भला हो स्थानीय लोगों का, जिन्होंने भोले भाले पहाड़ियों को कुछ हद तक पुलिस के जुल्म से बचाया। रामपुर तिराहे पर 2 अक्टूबर की सुबह का मंजर बेहद खौफनाक था। सड़क पर लोगों की लाशें पड़ी थीं। खून से लथपथ लोग इधर-उधर पड़े थे। महिलाएं आबरू बचाने के लिए सिसक रही थी।

रामपुर तिराहा कांड ने सियासत का रुख भी मोड़ दिया। उत्तराखंड में मुलायम सिंह खलनायक बन गए। उनकी पार्टी पहाड़ में पैर जमा ही नहीं पाई। राज्य आंदोलन की आग और तेज हुई। आंदोलन में खटीमा और मसूरी के बाद रामपुर तिराहे का नाम भी जुड़ गया। 1994 की इस घटना ने जन जन में ऐसा आक्रोश भरा कि सियासत को झुकना पड़ा। आखिरकार 9 नवंबर 2000 को नए राज्य उत्तराखंड का उदय हुआ।

 

ये हुए शहीद

– देहरादून के नेहरु कालोनी निवासी रविंद्र गोलू रावत

– बालावाला निवासी सतेंद्र चौहान

– बदरीपुर निवासी गिरीश भदरी

– अजबपुर निवासी राजेश लखेड़ा

– ऋषिकेश निवासी सूर्यप्रकाश थपलियाल

– ऊखीमठ निवासी अशोक कुमार

– भानियावाला निवासी राजेश नेगी

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