लॉकडाउन में माटी की सेवा का जज्बा दिखाया, बंजर जमीन को किया आबाद, लेकिन आज लाखों के उत्पादों को खरीददार नहीं मिल रहा
ALMORA: पहाड़ के युवा स्वरोजगार करें भी तो कैसे, हर पल मनोबल तोड़ने वाली बातें उनके सामने मुंह फैलाए खड़ी रहती हैं। पहाड़ क युवा लॉकडाउन में घर लौटा, तो सोचा नौकरी छोड़कर अपनी माटी की सेवा करूं। लाखों रुपए बागवानी पर खर्च किए, पैदावार भी खूब हुई लेकिन बदकिस्मती देखिए, (Pahari Youth disappointed as no buyer for his organic products) आज उसके उत्पादों को खरीददार तक नहीं मिल रहा। लाखों रुपए की लहसुन सड़ने की कगार पर है।
ये कहानी है अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र के ग्राम बौड़ तल्ला निवासी भरत सिंह रावत की। जब लॉकडाउन लगा तो भरत पैदल ही हिमाचल से घर वापस आया। मिट्टी की कीमत पता चली तो भरत ने अपनी माटी की सेवा करने की ठानी। घर में ही रहकर स्वरोजगार का फैसला लिया। अपनी मेहनत से बंजर पड़ी जमीन को आबाद किया। भरत ने 100 नाली बंजर पड़ी जमीन को आबाद किया और वहा लहसुन लगाई। भरत के इस प्रोजेक्ट पर करीब पांच लाख रुपए का खर्च आया। भरत की मेहनत का अच्छा फल मिला और बंपर पैदावार भी हुई।

लेकिन उत्तराखंड में सरकारें लाख दावे कर लें, हमारे उत्पादों की मार्केटिंग और खरीददारी की उचित व्यवस्था नहीं है। खासतौर से पहाड़ों में मार्केटिंग और खरीद का सिस्टम पूरी तरह लड़खड़या हुआ है। भरत के साथ भी ऐसा ही हुआ। भरत को उम्मीद थी कि उसकी मेहनत से पैदा की गई 10 कुंतल लहसुन को बाजार मिलेगा, अच्छा भाव मिलेगा, लेकिन कीमत मिलना तो दूर इस लहसुन को खरीददार तक नहीं मिल पा रहे। बोरियों में भरी लहसुन खराब होने की कगार पर है। भरत का कहना है कि जब आपकी मेहनत को पूरा फल न मिले तो निराशा स्वाभाविक है। इससे उनका मनोबल टूट सा गया है। सरकार को चाहिए कि स्थानीय स्तर पर उत्पादों की खरीद सुनिश्चित हो सके। इससे अन्य लोग भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित होंगे। लेकिन भरत की लहसुन खराब होने के कगार पर है, करीब 1 कुंतल लहसुन लोकल मार्केट में थोड़ा थोड़ा करके बेची भी, लेकिन वहां खपत बेहद सीमित मात्रा में है। रानीखेत मंडी में बेचने के लिए कई तरह की सोर्स की जरूरत होती है। भरत का कहना है कि इन हालातों में शायद ही कोई युवा अब आगे कोई पहल करे।


