पौड़ी: खिर्सू के पौराणिक कठबद्दी मेले में उमड़ा जनसैलाब, आस्था, परंपरा और स्टंट का अद्भुत संगम
PAURI: गांव के दो सिरों पर 150 मीटर लंबी रस्सी पर फिसलकर करतब दिखाता काठ (लकड़ी) का बद्दी, तालियां बजाकर मन्नते मांगते लोग और आस्था व उल्लास जनसैलाब । ये नजारा था 28 अप्रैल को पौड़ी गढ़वाल के खिर्सू क्षेत्र में आयोजित कठबद्दी मेले का। हर साल खिर्सू के ग्वाड़ और कोठगी गांवों के लोग कठबद्दी मेले का आयोजन करते आ रहे हैं। माना जाता है कि पहले इस रस्सी के सहारे बद्दी समुदाय के लोग करतब दिखाते हुए फिसलते थे। इसमें आस्था तो जुड़ी थी लेकिन जीवन का खतरा भी बना रहता था। कालांतर में ये आस्था तो कम नही हुई लेकिन मानव जीवन को ध्यान में रखकर इसमें थोड़ा बदलाव भी आया। अब बद्दी समुदाय के लोग यहां करतब नहीं करते, लेकिन प्राचीन परंपरा के निर्वहन के लिए रस्सी के सहारे लकडी के बने बद्दी को फिसलाया जाता है।
बद्दी मेले का इतिहास
ग्वाड़ -कोठगी के बद्दी मेले का इतिहास हजार वर्ष से भी पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि गावों में ग्वाड़ और कोठगी गांवों में ठंडा स्थान होने के कारण फसल देर में पकती थी तो अपने इष्ट देव को प्रसन्न करने हेतु घंडियाल देवता की पूजा करते थे। घंडियाल देवता को शिवजी का प्रमुख गण माना जाता है। वैशाख के महीने पूजा एवं कौतुक करके देवता को प्रसन्न करते थे। कौतुक में मुख्य स्थान बद्दी जाति के लोगों द्वारा विभिन्न प्रकार के नाच गान -करतब -और रस्सी पर फिसलने जैसा साहसिक करतब भी किया जाता था। इससे देवता प्रसन्न होकर आंधी तूफान और बारिश करके अपना आशीर्वाद देते थे और दैव योग से कुछ ही दिन में गेहूं की फसल तेजी से पक जाती थी। इससे इन लोगों का घंटाकर्ण देवता पर आज तक भी अटूट विश्वास है। घंडियाल देवता की यह पूजा वर्तमान दोनों गांवों की संयुक्त सीमा पर की जाती थी। (यानी आज के धौड़िया के किसी स्थान पर) इसी धौड़िया स्थान से घंडियाल देव दुख विपत्ति या खुशी के अवसर पर धात (ऊंची आवाज) लगाकर इस स्थान के दोनो ओर रहने वालों को सजग करते रहते थे।
बद्दी समुदाय का गहरा नाता
बद्दी या बादी जाति के लोग मूलतः हिमालय की ऊंचाइयों में रहने वाले (संभवतः बद्रीनाथ धाम के आसपास के ) लोग थे। उसी क्षेत्र में जहां आज भी गद्दी (भेड़ बकरी चराने वाले) लोग भी रहते थे। गद्दी जाति के लोग अपने भेड़ बकरी लेकर हिमालय से तराई तक घूमते रहते हैं। उन्हीं की तर्ज पर बद्दी जाति (बद्री और गद्दी का मिश्रित अपभ्रंश) भी घूमते रहते थे। ये लोग गाना लगाने, नृत्य करने, एवं शारीरिक सौष्ठव के विभिन्न करतब करके लोगों का मनोरंजन करके जीवन यापन करते थे। स्टंट कार्य करने में पारंगत होते थे। घंडियाल देव की पूजा में भी बद्दी समुदाय बढ़चढ़कर हिस्सा लेता था और स्टंट दिखाकर लोगों को मोहित करता था।1500 ईसवी के आसपास जब गढ़वाल की राजधानी देवलगढ़ बनी तो यहां बद्दी समुदाय के स्टंट को खास पहचान मिली। देवलगढ़ के करीब स्थित ग्वाड़ और कोठगी के लोगों ने भी राजा के मनोरंजन के लिए बद्दी को रस्सी के सहारे फिसलाने का कार्यक्रम बनाया। बद्दी को रस्सी पर फिसलने के लिए काठ का रथ बनाया गया । लेकिन स्टंट करने वाले बद्दी ने राजा से मांग की कि अगर उसकी शादी करवाई जाएगी तो ही वो रस्सी पर फिसलेगा। राजा ने वचन दिया। धूमधाम से युवा बद्दी को नहलाया गया। बांदे दिये गये। मंगल गीत गाये गये। इष्टदेव घंटाकर्ण स्वामी की पूजा की गई। और निर्धारित स्थान पर बद्दी अपने काठ के रथ पर बैठ कर फिसलने के खतरनाक एवं दुस्साहसिक कार्य को सफलता पूर्वक पूरा किया।
घंडियाल देवता की पूजा के साथ साथ इस हैरतअंगेज घटना को देखने के लिए दूर दराज से भीड़ जुटने लगी। राजा ने खतरनाक खेल के दृष्टिगत गांववालों को रस्सी की लंबाई सीमित 500 मीटर करने को कहकर प्रतिवर्ष घंडियाल देव की पूजा का आदेश दिया और त्योहार की तिथि वैशाख के महीने तीसरे सोमवार को निश्चित की। प्रतिवर्ष मेले के संबंध में राजा को सूचना देने को भी कहा। और इस प्रकार बद्दियों की कृपा से घंडियाल देव घंटाकर्ण स्वामी के इस त्योहार को पूरे क्षेत्र में प्रसिद्धि मिल गयी।
बाद में कई बार हादसे के कारण रस्सी की लंबाई को कम किया गया। और असल बद्दी के बजाए काठ के बद्दी को फिसलने के लिए प्रयोग किया गया। यानी आस्था और मनोरंजन वही रहा बस थोड़ सा बदलाव हो गया। पिछले सैकडों वर्षों से स्थानीय लोग हर साल धूमधाम से कठबद्दी मेले का आयोजन करते हैं। काठ के बने बद्दी को सुख समृद्धि की कामना के साथ लगभग 150 मीटर रस्सी पर फिसलाया जाता है। जानकारों की मानें तो पहले 100 से ज़्यादा गाँव इस त्यौहार को मनाते थे। आज, पौड़ी जिले के सिर्फ़ दो गाँव- ग्वाड़ और कोठगी- इसे बदले हुए स्वरूप में मनाते हैं।
