आस्था या दैवीय चमत्कार: नंदा बड़ी जात में अगुआई कर रहे एक नहीं बल्कि दो दो चौसिंग्या खाडू
: मां नंदा देवी की बडी जात सिद्ध पीछ कुरुड़ से शुरू हो चुकी है। दोपहल करीब तीन बजे मां नंदा की डोलियों ने चौसिंग्या खाडुओं के साथ हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में कैलाश के लिए प्रस्थान किया। इस दौरान अपनी बहन-बेटी नंदा को ससुराल के लिए विदा देते वक्त लोग भावुक नजर आए। इस बार की बडीजात यात्रा में एक नहीं बल्कि दो दो चारसींग वाले मेंढ़े नजर आ रहे हैं।
इसे दैवीय चमत्कार मानें या या आस्था की ताकत,..इस बार दो दो चौसिंग्या खाडू नंदा बड़ी जात में शामिल हो रहे हैं। काले भूरे रंग का यह चौसिंग्या खाडू सुंग गांव के रमेश सिंह बिष्ट की गौशाला में पैदा हुआ है। इसकी उम्र 8 महीने बताई जा रही है। इससे पहले 2014 की राजजात में भी सुंग गांव से ही चौसिंग्या खाडू मां नंदा का देवरथ बना था। इसके अलावा सफेद रंग का ये दूसरा चौसिंग्या खाडू भी नंदा जात की अगुआई कर रहा है। कैलाश के लिए रवाना होने से पहले इसकी विशेष पूजा अर्चना की जा रही है। लोग इस पर चुनरी बांधकर मनौती मांग रहे हैं, मां नंदा का सामान भी इसमें रखा जा रहा है। ये खाडू आकार और उम्र में पहले खाडू से कुछ छोटा दिख रहा है। स्थानीय लोग इसे मां नंदा का विशेष चमत्कार मान रहे हैं।
मां नंदा की कैलाश विदाई की अद्भुत यात्रा का सबसे खास पहलू है चार सींगों वाला नर भेड़ यानी चौसिंग्या खाडू। ये चौसिंग्या खाडू ही मां नंदा की राजजात या बड़ीजात की अगुआई करता है। इसे मां नंदा का शुभदूत और संदेशवाहक माना जाता है। यात्रा के दौरान खाडू की पीठ पर ओढाए जाने वाले कपड़े पर मां नंदा के लिए श्रृंगार सामग्री, वस्त्र स्थानीय पकवान, कीमती आभूषण बांधते हैं। यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड पहुंचने के बाद इसे कैलाश की ओर अकेला विदा किया जाता है, जहां यह हिमालय की श्रृंखलाओं में आगे जाकर अंततः विलुप्त हो जाता है। यानि होमकुंज से मां नंदा की विदाई के बाद ये खाडू की अकेला साथी होता है जो मां नंदा को कैलाश ले जाता है।