इंसानी दखल का असर, अपनी आवाज बदलने को मजबूर हो गया हमारा राज्य पक्षी मोनाल
DEHRADUN: क्या हिमालय की शान मोनाल पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है? क्या उत्तराखंड के राज्य पक्षी मोनाल को इंसानी दखल का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है? जी हां…वैज्ञानिको के शोध से जो संकेत मिल रहे हैं, वो चिंता बढ़ाने वाले हैं।
हिमालयी बुग्यालों में अनियंत्रित भीड़ और मानवीय हस्तक्षेप से इको सिस्टम तंत्र पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे पक्षी व अन्य जीव-जंतु भी अछूते नहीं हैं। और इसका ताजा उदाहरण है, उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल। पहाड़ों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और बेलगाम टूरिज्म की वजह से इनके आवास औऱ व्यवहार पर असर पड़ रहा है।
अपनी चमकदार रंगत और खूबसूरत पंखों के लिए मशहूर मोनाल सिर्फ पहाड़ की खूबसूरती का हिस्सा नहीं है, बल्कि इकोसिस्टम का अहम घटक भी है। पहाड़ों की संस्कृति, यहां की लोक-कथाओं और हिमालय की पहचान में मोनाल का अहम हिस्सा है। मोनाल आमतौर पर 2100 मीटर से 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। उत्तराखंड में मोनाल पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। लेकिन केदारघाटी और मद्महेश्वर घाटी इसके हॉटस्पॉट माने जाते हैंष शायद इसीलिए आपको चोपता या तुंगनाथ में अक्सर मोनाल के दीदार हो जाते हैं।
लेकिन अब ऐसी रिसर्च सामने आई है जो इन पक्षियों के भविष्य पर सवाल खड़े करती है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के द्वारा अगस्त 2025 में Behavioural Processes पत्रिका में छपे शोध की मानें तो हिमालयी बुग्यालों में इंसानी दखल और शोर-शराबे के कारण मोनाल की आवाज बदल रही है। पहाड़ी इलाकों में इंसानी गतिविधियों की वजह से मोनाल अपने साथियों से संवाद करने, प्रतिद्वंद्वियों को ललकारने या सावधान रहने के संकेत के लिए तरीके बदल रहा है। शोधकर्ताओं ने मोनाल की आवाज के 700 से ज्यादा नमूने रिकॉर्ड किए और पाया कि चोपता वैली में बढ़ती भीड़ और दखल के कारण मोनाल को संवाद के लिए ज्यादा जोर से आवाज लगानी पड़ रही है। यहां मोनाल सामान्य से अधिक हाई फ्रीक्वेंसी पर आवाज निकाल रहे हैं।इसकी तुलना में मद्महेश्वर घाटी थोड़ी शांत है, लिहाजा यहां मोनाल की पिच थोड़ी कम आंकी गई है। इसके पीछे कारण वही है, चोपता तुंगनाथ में पर्यटकों की भीड़, वाहनों का दबाव, और लोगों का बढ़ता शोर शराबा। शोधकर्ताओं की मानें तो मोनाल ने अपने व्यवहार में बदलाव किया है।
एक्सपर्ट के मुताबिक मोनाल आवाज का इस्तेमाल आपस में संवाद करने और प्रजनन के लिए साथी को आकर्षित करने में करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस शोर के कारण उनके आपसी कम्युनिकेशन में बाधा आ रही है, जिससे उनके प्रजनन काल और व्यवहार पर बुरा असर पड़ सकता है।
एक दूसरी स्टडी भी मोनालों पर खतरे की ओर इशारा कर रही है। 2025 में Scientific Reports पत्रिका में प्रकाशित इस स्टडी में पाया गया कि ये पक्षी पहाड़ों में ज्यादा ऊंचाई पर जाने को मजबूर हैं। इसकी वजह है कि अल्पाइन घास के मैदानों में इनके प्राकृतिक आवास में भीड़ बढ़ रही है। रिसर्च बताती है कि ये पक्षी अब धीरे-धीरे हिमालय में ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं क्योंकि बर्फ पिघल रही है और वहां पेड़-पौधे उग रहे हैं, जिससे यह इलाका उनके लिए सुलभ हो गया है। रिसर्चर के मुताबिक ऊपर की ओर जाने के लिए मोनाल को मजबूर किया गया है क्योंकि उनके नेचुरल हैबिटेट रहे बुग्यालों में इंसानों का दखल लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों की मानें तो मौसम में बदलाव के कारण पक्षियों का मौसमी प्रवास और मुश्किल हो सकता है, क्योंकि उन्हें पहाड़ों पर ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। उनकी आबादी अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएगी, जिससे अलग-अलग समूहों के बीच प्रजनन की संभावना कम हो जाएगी और आने वाले समय में किसी खास इलाके से उनके विलुप्त होने का खतरा भी बढ़ सकता है।